
एंटी माओवादी ऑपरेशन में इंस्पेक्टर आशीष शर्मा शहीद: पूरा घटनाक्रम
कर्तव्य पथ पर वीरगति: एंटी-माओवादी ऑपरेशन में इंस्पेक्टर आशीष शर्मा शहीद
भारत के हृदयस्थल की दुर्गम और घने जंगलों वाली भूमि—जहाँ उम्मीद और खतरा दोनों साथ छिपे रहते हैं—एक बार फिर माओवादी उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई में देश ने अपना एक बहादुर जवान खो दिया।
19 नवंबर 2025 को मध्य प्रदेश की एलिट हॉक फोर्स के 40 वर्षीय इंस्पेक्टर आशीष शर्मा छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के घोर जंगलों में माओवादियों से हुई मुठभेड़ में शहीद हो गए। यह घटना एमपी–छत्तीसगढ़–महाराष्ट्र त्रि-जंक्शन के पास हुई, जो इस क्षेत्र में सुरक्षा बलों के सामने मौजूद निरंतर खतरे को उजागर करती है।
मुठभेड़: सुबह-सवेरे जंगल में घातक हमला
ऑपरेशन एक संयुक्त मिशन के रूप में शुरू हुआ, जहाँ खुफिया सूचना मिली थी कि सीपीआई (माओवादी) की जीआरबी (गोंदिया–राजनांदगांव–बालाघाट) डिवीजन के भारी संख्या में हथियारबंद उग्रवादी इलाके में सक्रिय हैं।
सुबह 7 से 8:30 बजे के बीच मध्य प्रदेश हॉक फोर्स, छत्तीसगढ़ पुलिस, महाराष्ट्र की C-60 कमांडो टीम और आईटीबीपी का संयुक्त दस्ता कौहापानी क्षेत्र (थाना बोर्टालाब) के घने जंगलों की ओर बढ़ा। सुरक्षाबलों ने माओवादियों से आत्मसमर्पण की अपील भी की, परंतु उग्रवादियों ने ऊँचाई से ताबड़तोड़ फायरिंग कर अचानक हमला बोल दिया।
कई घंटों तक चली मुठभेड़ में गोलियों की गड़गड़ाहट घाटियों में गूँजती रही।
इंस्पेक्टर आशीष शर्मा, जो हमेशा मोर्चे पर सबसे आगे रहते थे, एक तीन-सदस्यीय अग्रिम टीम का नेतृत्व कर रहे थे। क्रॉसफायर के बीच वे गंभीर रूप से घायल हुए—गोलियां उनकी जांघ और पेट में लगीं।
भारी फायरिंग के बीच उन्हें किसी तरह डोंगरगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुँचाया गया। डॉक्टरों ने एअर एंबुलेंस तक की व्यवस्था की, लेकिन अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उन्हें बचाया नहीं जा सका।
सौभाग्य से अन्य कोई जवान घायल नहीं हुआ। शुरुआती संकेत बताते हैं कि माओवादियों की तरफ भी क्षति हुई है, जिसकी खोज जारी है।
यह मुठभेड़ 48 घंटे में दूसरी बड़ी घटना थी—इससे पहले छत्तीसगढ़-आंध्र सीमा पर 14 नक्सलियों, जिनमें कमांडर मदवी हिडमा भी था, को ढेर किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि इन्हीं दबावों के कारण माओवादी बचे हुए दस्ते ने बेतहाशा हमला किया।
वीरता की मिसाल: वर्दी के पीछे का योद्धा
इंस्पेक्टर आशीष शर्मा सिर्फ एक पद नहीं थे—वे माओवादी-विरोधी युद्ध की कठिनाइयों में तपे हुए साहस और समर्पण का प्रतीक थे।
बालाघाट जिले में लंबे समय से तैनात, वे दो बार गैलेंट्री मेडल से सम्मानित किए जा चुके थे।
फरवरी 2025 में उनकी अगुवाई में रौंड़ा जंगल (बालाघाट) में एक बड़ी सफलता मिली थी, जब तीन कुख्यात महिला माओवादी कमांडरों को मार गिराया गया था—प्रत्येक पर ₹20 लाख से अधिक का इनाम था। इस ऑपरेशन ने उन्हें आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन भी दिलाया।
सहकर्मी उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद करते हैं जो सामने से नेतृत्व करता था, प्रेरित करता था और कभी पीछे नहीं हटता था।
घर में वे अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों के लिए प्रेरणा और सहारा थे। उनका जाना परिवार और देश दोनों के लिए एक गहरी क्षति है।
श्रद्धांजलि और संकल्प: राष्ट्र हुआ शोकमग्न
इंस्पेक्टर शर्मा की शहादत की खबर फैलते ही पूरे देश में शोक और गर्व की लहर दौड़ गई।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने एक्स पर उन्हें “मध्य प्रदेश का वीर सपूत” बताते हुए कहा कि नक्सलवाद उन्मूलन के राष्ट्रीय अभियान में उनका सर्वोच्च बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा।
राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की घोषणा भी की गई।
छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने संयुक्त अभियानों को और तेज करने का संकल्प जताया।
स्पेशल डीजी (एंटी-नक्सल ऑपरेशंस) पंकज श्रीवास्तव ने बताया कि मौके से हथियार, गोला-बारूद और माओवादी साहित्य बरामद हुआ है—जो उग्रवादियों के लिए बड़ा नुकसान है।
इस बीच, गृह मंत्रालय के अक्टूबर 2025 के डेटा के अनुसार, देश में LWE से प्रभावित जिलों की संख्या 18 से घटकर 11 रह गई है। लेकिन शर्मा की शहादत यह याद दिलाती है कि इन आँकड़ों के पीछे अनगिनत सैनिकों का खून, पसीना और बलिदान है।
लंबे संघर्ष की याद: जंगलों की छाया में चल रहा युद्ध
आशीष शर्मा की कहानी भारत के उस लम्बे संघर्ष का हिस्सा है, जिसने 1980 के दशक से अब तक 10,000 से अधिक जानें ले ली हैं।
बस्तर और बालाघाट जैसे क्षेत्रों में, जहाँ गरीबी और अलगाव माओवादियों की भर्ती को बढ़ावा देते हैं, शर्मा जैसे अधिकारी ही जनता और राज्य के बीच पुल का काम करते हैं।
उनकी शहादत यह संदेश देती है कि केवल बंदूक नहीं—बल्कि विकास, अधिकार और संवाद भी इस संघर्ष के स्थायी समाधान हैं।
हॉक फोर्स के उनके साथी अब और दृढ़ संकल्प के साथ जंगलों में तलाशी अभियान जारी रखे हुए हैं।
एक साथी अधिकारी के शब्दों में:
“वह सिर्फ माओवादियों से नहीं लड़ते थे, बल्कि डर से भी लड़ते थे।”
इंस्पेक्टर आशीष शर्मा—आपकी वीरता सदैव अमर रहे
आपकी रोशनी उन अंधेरे जंगलों को भी चीरती रहेगी।
शत शत नमन, वीर सपूत।

