सिंध पर राजनाथ सिंह का बड़ा बयान: इतिहास, विरासत और भू-राजनीति के बीच उठी नई बहस
सिंध पर राजनाथ सिंह का बयान: इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और भू-राजनीति के बीच गूंजती एक नई बहस
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के 23 नवंबर 2025 को दिए गए बयान ने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में तीखी बहस छेड़ दी है। नई दिल्ली में सिंधी विरासत और विभाजन पीड़ितों को समर्पित एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा—
“आज भले ही सिंध भारत का हिस्सा नहीं है, लेकिन सभ्यतागत रूप से सिंध हमेशा भारत का ही हिस्सा रहेगा। और जहां तक ज़मीन की बात है, सीमाएं बदलती रहती हैं। कौन जानता है, कल सिंध फिर भारत में आ जाए।”
यह बयान सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक निरंतरता और बदलते क्षेत्रीय समीकरणों का संकेत भी माना जा रहा है।
“Who knows, Sindh might become part of India one day,” says Indian Defence Minister Rajnath Singh pic.twitter.com/tF9zx2ypIO
— Sidhant Sibal (@sidhant) November 23, 2025
इतिहास और सांस्कृतिक जुड़ाव: सिंध भारत की सभ्यता का मूल स्तंभ
सिंध का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है।
3300–1300 ईसा पूर्व की सिंधु घाटी सभ्यता—मोहनजोदड़ो जैसे नगर—भारत की प्राचीन विरासत का गर्व हैं।
सदियों तक यह क्षेत्र हिंदू, बौद्ध और बाद में इस्लामी राजवंशों का केंद्र रहा, जिसने इसे एक अनूठी मिश्रित संस्कृति दी।
सिंधु नदी, जिसे हिंदू परंपरा में वैदिक संस्कृति की जन्मस्थली माना जाता है और जिसे सिंधी मुसलमान भी पवित्र मानते हैं, दोनों देशों के साझा इतिहास का आधार है।
राजनाथ सिंह ने अपने भाषण में वरिष्ठ नेता एल.के. आडवाणी का उल्लेख भी किया—जो सिंध से विस्थापित हुए थे लेकिन भावनात्मक रूप से अपने जन्मस्थान से कभी अलग नहीं हुए।
1947 के विभाजन ने सिंध को पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया और लाखों हिंदुओं-सिखों को पलायन करना पड़ा।
आज भारत में लगभग 28 लाख सिंधी अभी भी चेtti चांद, झूलेलाल पूजा और सूफ़ी परंपराएँ जीवित रखते हैं—इस सांस्कृतिक रिश्ते की स्थायी गवाही के रूप में।
भू-राजनीतिक संदेश: क्या पाकिस्तान को परोक्ष चेतावनी?
राजनाथ सिंह का यह बयान सिर्फ सांस्कृतिक प्रसंग नहीं माना जा रहा।
यह उस समय आया है जब भारत-पाकिस्तान संबंध अत्यंत तनावपूर्ण हैं।
यह remark “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद सामने आया है—जिसे भारत ने सीमा पार आतंकवादी हमलों के जवाब में अंजाम दिया बताया जाता है।
इसके अलावा, सितंबर 2025 में मोरक्को में सिंह ने कहा था कि “पीओके अपनी निराशा के कारण खुद भारत की ओर लौट आएगा।”
इन संकेतों को देखते हुए विश्लेषक इसे भारत की बढ़ती रणनीतिक assertiveness का हिस्सा मान रहे हैं।
पाकिस्तान, जो पहले से आर्थिक संकट, बलूच विद्रोह और सिंधी राष्ट्रवादी आंदोलनों (जैसे जिए सिंध मुत्ताहिदा महाज़) से जूझ रहा है, इसे सीधे खतरे के रूप में देख रहा है।
भारत की विदेश नीति, जिसने अनुच्छेद 370 हटाने से लेकर चीन सीमा पर सैन्य मजबूती तक कई बड़े निर्णय लिए, अब दक्षिण एशिया के मानचित्र को वैचारिक रूप से चुनौती देती दिख रही है।
प्रतिक्रियाएँ: उत्साह, आलोचना और अंतरराष्ट्रीय चिंता
बयान के बाद सोशल मीडिया पर #SindhWillReturn ट्रेंड करने लगा।
बीजेपी समर्थकों ने इसे “अखंड भारत” की अवधारणा को मजबूत करने वाला कदम बताया।
सिंधी संगठनों ने इसे अपनी ऐतिहासिक पीड़ा की मान्यता कहा।
दूसरी ओर, विपक्ष ने इसे “गैर-ज़िम्मेदार बयान” और “ध्यान भटकाने की राजनीति” बताया।
पाकिस्तान ने इसे “आक्रामक और अस्वीकार्य” कहते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज की।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका ने भाषा में संयम बरतने की सलाह दी, जबकि चीन ने “क्षेत्रीय स्थिरता” बनाए रखने की बात दोहराई।
यह बयान: भावनात्मक प्रतीकवाद या रणनीतिक रोडमैप?
विशेषज्ञों का मानना है कि राजनाथ सिंह का बयान सिर्फ एक भावुक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत की बदलती विश्वदृष्टि का संकेत है—जहाँ सांस्कृतिक शक्ति और सामरिक आत्मविश्वास साथ चलते हैं।
यह बयान यह भी याद दिलाता है कि विभाजन का दर्द आज भी दोनों देशों के समाजों में मौजूद है।
लेकिन ऐसी टिप्पणियाँ क्षेत्रीय तनाव बढ़ा सकती हैं और दक्षिण एशिया में संवाद की संभावनाएँ कम कर सकती हैं।
फिर भी, एक बात स्पष्ट है—सिंध की स्मृति और सांस्कृतिक कड़ी इतनी गहरी है कि राजनीतिक सीमाएँ भी उसे पूरी तरह मिटा नहीं सकीं।
आज जब दुनिया की सीमाएँ लगातार बदलती धारणाओं से प्रभावित हो रही हैं, राजनाथ सिंह के शब्द एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं:
क्या सिंध का “वापसी” विचार एक ऐतिहासिक भावना है, भू-राजनीतिक संकेत है, या मेल-मिलाप की एक प्रतीकात्मक पुकार?
फिलहाल, यह बहस सिंधु से गंगा तक गूंज रही है—कुछ रिश्ते नक्शों की रेखाओं से बड़े होते हैं।

