सुप्रीम कोर्ट का मानवीय फैसला: गर्भवती सोनाली खातून और 8 वर्षीय बेटे को भारत लौटाने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट का मानवीय फैसला: गर्भवती सोनाली खातून और 8 वर्षीय बेटे को भारत लौटाने का आदेश

 

सुप्रीम कोर्ट ने गर्भवती महिला और बेटे की वापसी का आदेश दिया: मानवीय हस्तक्षेप की बड़ी मिसाल

नई दिल्ली, 3 दिसंबर 2025 — सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह बंगाल की रहने वाली सोनाली खातून और उनके आठ वर्षीय बेटे सबीर को तुरंत भारत वापस लाए। सोनाली आठ महीने की गर्भवती हैं और कोर्ट ने कहा कि उनकी सेहत और बच्चे के जन्म को देखते हुए, उन्हें तुरंत भारत लौटने दिया जाना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा दिए गए इस भरोसे को रिकॉर्ड पर लिया कि भारत लौटने पर सोनाली को मुफ्त इलाज, जरूरी सुविधाएं और सुरक्षित ठहरने की जगह दी जाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे की रोजमर्रा की देखभाल सुनिश्चित की जाए और उन्हें बिरभूम (पश्चिम बंगाल) में अपने परिवार के पास रहने की अनुमति दी जाए।

यह फैसला एक लंबे और पीड़ादायक कानूनी संघर्ष का अहम मोड़ है, जिसने देश में चल रहे पहचान सत्यापन अभियानों और नागरिकता से जुड़े सवालों पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है।

Sonali Khatoon

घटना कैसे शुरू हुई: पहचान जांच और फिर निर्वासन

18 जून 2025 को दिल्ली पुलिस ने सोनाली (25), उनके पति दानिश शेख और बेटे सबीर को एक पहचान सत्यापन अभियान के दौरान हिरासत में लिया। यह अभियान गृह मंत्रालय की उस अधिसूचना के बाद तेज हुआ था, जिसमें अवैध प्रवासियों की पहचान पर जोर दिया गया था।

परिवार मूल रूप से पश्चिम बंगाल के बिरभूम जिले का रहने वाला है और लंबे समय से दिल्ली में मजदूरी कर रहा था। उनके पास आधार कार्ड थे और परिवार के दादा-दादी का नाम बंगाल की मतदाता सूची में दर्ज था। इसके बावजूद, उन्हें बांग्लादेशी नागरिक बताकर 26–27 जून की रात सीमा पार भेज दिया गया

इसी अभियान में एक और परिवार—स्वीटी बीबी, उनके पति आमिर खान और दो बेटों—को भी बांग्लादेश भेजा गया।

बांग्लादेश पहुंचने पर सभी को अगस्त में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें “फॉरेनर्स” एक्ट के तहत जेल में रखा गया। सोनाली तब पांच महीने की गर्भवती थीं और जेल की परिस्थितियों ने उनके स्वास्थ्य को गंभीर खतरे में डाल दिया।

उनके पिता भदू शेख ने इसे “डरावना सपना” बताते हुए कहा, “मेरी बेटी भारतीय है। मेरा पोता भारतीय है। वह अपना बच्चा विदेशी जमीन पर क्यों जन्म दे?

कानूनी लड़ाई: हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक

सोनाली और आमिर खान के परिवारों ने कोलकाता हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

सितंबर 2025 में हाई कोर्ट ने इस निर्वासन को ‘अवैध’ और ‘हड़बड़ी में लिया गया फैसला’ बताया, और साफ कहा कि बिना पूरी जांच के किसी को निर्वासित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने चार सप्ताह के अंदर सातों लोगों को भारत वापस लाने का आदेश दिया।

केंद्र सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और तर्क दिया कि यह आदेश भविष्य में अवैध प्रवासियों के मामलों पर असर डाल सकता है।

मामले में देरी के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 1 दिसंबर को कहा कि सोनाली की गर्भावस्था को देखते हुए उनका और बेटे सबीर का लौटना “सख्ती से मानवीय आधार पर” जरूरी है। कोर्ट ने टिप्पणी की —
“कुछ मामलों में कानून को इंसानियत के आगे झुकना पड़ता है।”

तीन दिसंबर को केंद्र ने कोर्ट को भरोसा दिया कि सोनाली और सबीर की वापसी तुरंत और आधिकारिक प्रक्रिया के तहत होगी।

उधर, बांग्लादेश की अदालत ने भी मानवता के आधार पर समूह को जमानत दी और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर उन्हें भारतीय नागरिक मानते हुए ‘पुशबैक’ का आदेश दिया था।

इसके बावजूद, वापसी में देरी होती रही, जब तक कि सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया।

 

व्यापक संदर्भ: बढ़ती कार्रवाई और बढ़ती चिंता

मई 2025 से देश के कई शहरों में पहचान सत्यापन अभियान तेज हुए हैं। दिल्ली और सीमावर्ती राज्यों में अब तक 1,500 से अधिक लोगों को बांग्लादेश भेजा जा चुका है।
मानवाधिकार समूहों का कहना है कि ऐसे अभियान गलत पहचान और वैध नागरिकों के उत्पीड़न का खतरा बढ़ा सकते हैं।
केंद्र सरकार का कहना है कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।

क्या मायने रखता है यह फैसला?

1. इंसानियत को प्राथमिकता देने वाली मिसाल

सोनाली का मामला दिखाता है कि गर्भवती महिला और बच्चे की सुरक्षा जैसी परिस्थितियों में अदालतें कानून से ज्यादा मानवीय पहलू को महत्व दे सकती हैं।

2. सरकारी प्रक्रियाओं की समीक्षा का दबाव

गलत पहचान और जल्दबाजी में की गई कार्रवाई पर सवाल उठे हैं।

3. भारत-बांग्लादेश संबंधों में राहत

अदालतों के बीच तालमेल से तनाव कम होगा और प्रक्रिया साफ़ हो सकती है।

4. पति दानिश की स्थिति अब भी अनिश्चित

आदेश केवल मां और बच्चे के लिए है, जबकि दानिश का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

सोनाली की डिलीवरी किसी भी दिन हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से कम से कम यह सुनिश्चित हो गया है कि वह अपने देश में, अपने परिवार के बीच सुरक्षित माहौल में बच्चा जन्म दे सकेंगी—यह जीत सिर्फ एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि उन सभी मामलों के लिए उम्मीद है जहाँ नागरिकता और इंसानियत अक्सर टकरा जाती हैं।

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